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दीपावली’ भगवान महावीर का निर्वाण दिवस
By admin | July 22, 2009
दीपावली पर्व भारतीय संस्कृति की सांस्कृतिक एकता का महान पर्व है। प्रत्येक धर्म, संस्कृति या विचारधारा के लोग इसे अपने-अपने रूप से मनाते हैं। इस दिन के साथ अनेक महापुरूषों के संबंध जुड़े हुए हैं। जैन परंपरा 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर के निर्वाण दिन को इसकी उत्पत्ति मानती है। ईसा से 599 वर्ष पहले कुण्डलपुर में क्षत्रिय वंश में पिता सिद्धार्थ और माता त्रिशला के यहां चैत्र शुक्ल तेरस को वर्द्धमान का जन्म हुआ। वर्द्धमान को महावीर के अलावा ‘वीर’, ‘अतिवीर’ और ‘सन्मति’ भी कहा जाता है। वर्द्धमान का बचपन राजमहल में बीता। ऐश्वर्य, संपदा की कोई कमी नहीं थी, वे इसका मनचाहा उपयोग, उपभोग कर सकते थे। लेकिन योवन अवस्था में तीस वर्ष की ही उम्र में वर्द्धमान ने दीक्षा ले ली। संसार की माया-मोह, सुख, ऐश्वर्य और राज्य को छोड़कर हृदय को कंपा देने वाली रोमांचकारी यातनाओं को सहन कर तपस्या की। उनका जीवन त्याग और तपस्या से ओतप्रोत था। ध्यान तपस्या में उनके शरीर के कपड़े गिरकर अलग होते गए, वे धयान में ही मग्न रहते। वर्द्धमान महावीर ने 12 साल तक मौन तपस्या की। अन्त में उन्हें ‘केवलज्ञान’ प्राप्त हुआ। केवलज्ञान प्राप्त होने के बाद 30 वर्ष तक महावीर ने जनकल्याण के लिए नगर – नगर गांव – गांव पदविहार कर उपदेश दिये। इस प्रकार 30 वर्ष तक उन्होंने गृहवास किया, 12 वर्षों तक तप किया और 30 वर्षों तक केवली अवस्था में रहे। बिहार स्थित पावापुर नगर में 72 वर्ष की आयु में अर्थात् अंतिम चातुर्मास में वर्षाकाल के तीन माह चुके थे, चौथा महीना भी आधा बीतने वाला था, उनका सतत निर्जल उपवास व तप प्रारम्भ हो चुका था। उपदेश की अंतिम धारा चल रही थी। दिव्य-ध्वनि हो रही थी, इसी बीच कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या आ पहुँची। स्वाति नक्षत्र का उदय हुआ, दिव्य-ध्वनि रुक गई, स्पंदन बंद हो गया। अंधकार पूर्ण निशा में देवताओं के आगमन से रत्नों और दीपों के प्रकाश से सारा नगर, सारा आकाश जगमगा उठा एक दिव्य ज्योति परम ज्योति में विलीन हो गई।
इस प्रकार कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि के अंतिम प्रहर और अमावस्या के प्रभात के स्वाति नक्षत्र में भगवान महावीर का निर्वाण हुआ । जैनधर्म में ‘निर्वाण’ शब्द का अर्थ सभी कर्मों को नष्ट कर सदा के लिए जन्म-मरण से मुक्त होना अर्थात मोक्ष प्राप्त करना है। इस प्रकार चौबीसवें तीर्थंकर महावीर बिहार स्थित पावापुर नगर से मोक्ष को प्राप्त हुए । जिस दिन पावापुर में उनका निर्वाण हुआ संपूर्ण पावापुरी नगरी दीपों से जगमगा उठी तब विश्व के अनेक राजाओं ने सत्य ज्ञान के प्रतीक रूप भौतिक दीप जलाकर अर्चना की। इसी उपलक्ष्य में देवताओं और राजाओं ने ज्ञान लक्ष्मी की पूजा की और दीपपर्व प्रारंभ हो गया। उसी दिन भगवान के प्रमुख शिष्य गौतम गणधर को कैवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ था। इस पर्व के एक दिन पहले ‘धन तेरस’ का पर्व भी मनाया जाता है। भगवान महावीर को तेरस के दिन संपूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हुई थी तब लोगो ने उस तिथि को ‘धन्य’ माना और कहा – ‘धन्य है वो तेरस जिस भगवान को संपूर्ण ज्ञान प्राप्त हुआ’, किन्तु वर्तमान में धन-वैभव प्रिय समाज ने सको ‘धनतेरस’ कहकर उसका सम्बन्ध रूपये-पैसे से जोड़ लिया इस दिन लोग चांदी, सोना, बर्तन इत्यादि खरीदना शुभ मानते है। और उसी रूप में उसे मनाते चले आ रहे है।
जैन धर्मानुयायी कार्तिक कृष्ण अमावस्या के दिन प्रातःकाल की बेला में पवित्र वस्त्र धारण कर मन्दिरों में जाते हैं। भगवान महावीर का सामूहिक पूजन करते हैं, निर्वाण कांड पढ़ते हैं और निर्वाण लाडू (लड्डू) चढ़ाते हैं। इसी दिन शाम को सभी लोग अपने-अपने घरों में दीपक जलाते हैं तथा साथ ही मोक्ष हेतु ज्ञान लक्ष्मी की आराधना करते हैं। दीपावली के दिन पटाखे, आतिशबाजी करने का कड़ा निषेध है, क्योंकि इससे पर्यावरण दूषित होता है और कई जीवों की हिंसा होती है। अहिंसा के पुजारी का निर्वाण दिवस मनाने में हिंसा होना वैसे भी युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होता है।
स्वदेश जैन
पीतमपुरा
9811644216
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